रोज़ इक नया सूरज है तिरी 'अताओं में
रोज़ इक नया सूरज है तिरी 'अताओं में
ए'तिमाद बढ़ता है सुब्ह की ज़ियाओं में
शायद उन दयारों में ख़ुश-दिली भी दौलत है
हम तो मुस्कुराते ही घिर गए गदाओं में
फूलती है अब सरसों दुल्हनों के हाथों पर
किस सदी में होते थे रंग भी हिनाओं में
भाइयों के जमघट में बे-रिदा हुईं बहनें
और सर नहीं छुपते माओं की दु'आओं में
बारिशें तो यारों ने कब की बेच डाली हैं
अब तो ख़ाक उड़ती है हर तरफ़ हवाओं में
सूनी सूनी गलियाँ हैं उजड़ी उजड़ी चौपालें
जैसे कोई आदम-ख़ोर फिर गया हो गाओं में
जब किसान खेतों में दोपहर को जलते हैं
लोटते हैं सग-ज़ादे कीकरों की छाओं में
तुम हमारे भाई हो बस ज़रा सी दूरी है
हम फ़सील के बाहर तुम महल-सराओं में
उन के दामनों से भी ख़ून रिसने लगता है
ज़ख़्म छुप नहीं सकते रेशमी रिदाओं में
दोस्ती के पर्दे में दुश्मनी हुई इतनी
रह गए फ़क़त दुश्मन अपने आश्नाओं में
और जंग क्या होगी जब कि नख़्ल ज़ैतूँ का
शाख़ शाख़ बटता है भूकी फ़ाख़्ताओं में
एक बे-गुनह का ख़ून ग़म जगा गया कितने
बट गया है इक बेटा बे-शुमार माओं में
बे-वक़ार आज़ादी हम ग़रीब मुल्कों की
ताज सर पे रक्खा है बेड़ियाँ हैं पाँव में
ख़ाक से जुदा हो कर अपना वज़्न खो बैठा
आदमी मु'अल्लक़ सा रह गया ख़लाओं में
अब 'नदीम' मंज़िल को रेज़ा रेज़ा चुनता है
घिर गया था बे-चारा कितने रहनुमाओं में
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