उड़ती हुई आवाज़ के अरमाँ की तरह था
उड़ती हुई आवाज़ के अरमाँ की तरह था
वो नक़्श कि मिट कर भी नुमायाँ की तरह था
सूरज में नुमायाँ हुआ ज़र्रा था हर इक शख़्स
कहते हैं कभी शह्र-ए-बयाबाँ की तरह था
चिंघाड़ती चिल्लाती हुई सब्ज़ हवा में
इक राज़ उतरते हुए तूफ़ाँ की तरह था
मौसम के मज़ाफ़ात पे बरसा है वही अब्र
जो सर में मिरे दूद-ए-परेशाँ की तरह था
थीं चारों तरफ़ धूप की दुश्वार फ़सीलें
यूँ मेरे लिए दश्त भी ज़िंदाँ की तरह था
आँखों की चमक थी कि बिखरते हुए पत्ते
कुछ ख़्वाब-ए-ख़िज़ाँ मतला'-ए-मिज़्गाँ की तरह था
'उर्यां के अक़ब-ज़ार को जाता हुआ जंगल
मुश्किल तो बहुत था मगर आसाँ की तरह था
आईना-ए-आशोब में धुँदलाया हुआ 'अक्स
'उनवाँ की तरह था कभी इम्काँ की तरह था
रौशन था 'ज़फ़र' वस्त में महताब-ए-मुलाक़ात
मैं चारों तरफ़ हाला-ए-हिज्राँ की तरह था
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