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वली दकनी पर स्कॉलर

दिल्ली के शुरुआती शायरों द्वारा वली दकनी की अज़मत (महानता) का हिचकिचाहट भरा एतिराफ़ (स्वीकार)

दिल्ली के शुरुआती शायरों ने वली दकनी के असर को महसूस तो किया, लेकिन इलाक़ाई भेदभाव के कारण उनकी बरतरी (श्रेष्ठता) को खुले दिल से मानने में हिचकिचाहट का शिकार रहे।

वली दकनी और उर्दू का शुरुआती सफ़र: फ़ारसी के साये से निकलने की जिद्द-ओ-जहद (कोशिश)

यह लेख उर्दू ज़बान के शुरुआती दौर की नफ़्सियाती कश्मकश (मानसिक उलझन), फ़ारसी के दबदबे और वली दकनी की शायरी के उस इंक़िलाबी (क्रांतिकारी) असर का जायज़ा लेता है जिसने उर्दू को एक बा-क़ायदा अदबी (साहित्यिक) ज़बान का दर्जा दिलाया।

शाह गुलशन का मशवरा: वली दकनी के ख़िलाफ़ गढ़ा गया एक अदबी अफ़साना

वली दकनी को शाह गुलशन की तरफ़ से रेख़्ता-गोई (उर्दू शायरी) में फ़ारसी विषयों को बाँधने के मशवरे की कहानी दरअस्ल दिल्ली के तज़किरा निगारों (इतिहासकारों) की मनगढ़ंत उपज है।

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