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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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गुलाब का प्रतीक पर स्कॉलर लेख

मीर तक़ी मीर की शायरी में मदनियत (शहरी जीवन) और मुग़ल पाईं बाग़ का इस्तिआरा (रूपक)

मीर तक़ी मीर के यहाँ 'गुल' (फूल) और 'चमन' (बाग़) की अलामतें (प्रतीक) ख़ुद-रौ (अपने आप उगने वाली) फ़ितरत (प्रकृति) की नहीं, बल्कि उभरती हुई शहरी तहज़ीब और मुग़लों के नफ़ासत-पसंद (सुरुचिपूर्ण) 'पाईं बाग़' की अक्कास (दर्शाने वाली) हैं।

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