मुझ से क़फ़स का दरवाज़ा क्या टूटेगा
पाँव पड़ी ज़ंजीर में खोई रहती हूँ
सर को क़फ़स पे रक्खे सय्याद कह रहा है
बुलबुल की जान निकला उजड़ा सा आशियाना
क़फ़स की चार-दीवारी में अब मैं मुतमइन हूँ
हवादिस साहिब-ए-औलाद भी हो जाएँ तो क्या
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
मुझ से क़फ़स का दरवाज़ा क्या टूटेगा
पाँव पड़ी ज़ंजीर में खोई रहती हूँ
सर को क़फ़स पे रक्खे सय्याद कह रहा है
बुलबुल की जान निकला उजड़ा सा आशियाना
क़फ़स की चार-दीवारी में अब मैं मुतमइन हूँ
हवादिस साहिब-ए-औलाद भी हो जाएँ तो क्या