अलामत (प्रतीक) की रचना में दोहराव का किरदार और कलात्मक पतन
शायरी में लफ़्ज़ों का दोहराव कब अलामत (प्रतीक) बनता है और कब यह महज़ शायर की कमज़ोर रचनात्मक ताक़त और आदत का नतीजा होता है?
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
शायरी में लफ़्ज़ों का दोहराव कब अलामत (प्रतीक) बनता है और कब यह महज़ शायर की कमज़ोर रचनात्मक ताक़त और आदत का नतीजा होता है?