ये कैसा ऐब है मेरे नगर के लोगों में
दिए जला न सके तो बुझाने आए हैं
ज़र ज़मीं तो न थी मुक़द्दर में
उस ने विर्से में दुश्मनी पाई
बदल न लें कहीं रस्ता ये आग की लपटें
हमें ही राख न कर दें ये नफ़रतें अपनी
इतना नज़रों से गिरा है कोई
उस को देखूँ तो हँसी आती है