निशात (ख़ुशी) की सहार और अहल-ए-हवस: फ़िराक़ की शायरी का एक अनोखा मनोवैज्ञानिक अध्ययन
विल्हेम रीच (Wilhelm Reich) के विचारों की रोशनी में फ़िराक़ गोरखपुरी का इश्क़ और 'हवस' का तसव्वुर पारंपरिक उर्दू शायरी से बिल्कुल अलग है। फ़िराक़ के नज़दीक अहल-ए-हवस (हवस वाले) वो हैं जो निशात और ख़ुशी की शिद्दत को बरदाश्त करने की सलाहियत नहीं रखते।