शब्दों पर पकड़: शायराना कमाल का कठिन मरहला
ख़यालात कितने ही बुलंद क्यों न हों, अगर शायर को शब्दों के चुनाव और उनकी तरतीब पर पूरी महारत हासिल नहीं है, तो उसकी शायरी बे-असर और अधूरी रहती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
ख़यालात कितने ही बुलंद क्यों न हों, अगर शायर को शब्दों के चुनाव और उनकी तरतीब पर पूरी महारत हासिल नहीं है, तो उसकी शायरी बे-असर और अधूरी रहती है।