तालिब-ए-दस्त-ए-हवस और कई दामन थे
हम से मिलता जो न यूसुफ़ के गरेबाँ से मिला
दस्त-ए-जुनूँ भी तंग हुआ दश्त-ए-इश्क़ में
अब चाक क्या करूँ कि गरेबान ही नहीं
सर-ब-कफ़ घर से निकलना तो है शर्त-ए-अव्वल
इतना आसान नहीं चाक-गरेबाँ होना
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
तालिब-ए-दस्त-ए-हवस और कई दामन थे
हम से मिलता जो न यूसुफ़ के गरेबाँ से मिला
दस्त-ए-जुनूँ भी तंग हुआ दश्त-ए-इश्क़ में
अब चाक क्या करूँ कि गरेबान ही नहीं
सर-ब-कफ़ घर से निकलना तो है शर्त-ए-अव्वल
इतना आसान नहीं चाक-गरेबाँ होना