अहमद मुश्ताक़: नई ग़ज़ल का एक अनोखा और खुरदरा लहजा
अहमद मुश्ताक़ की शायरी नासिर काज़मी की उदासी के उलट एक खुरदरा-पन, कठोरता और क्लासिकी रचाव लिए हुए है, जो उन्हें अपने दौर के शायरों में ख़ास बनाती है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
अहमद मुश्ताक़ की शायरी नासिर काज़मी की उदासी के उलट एक खुरदरा-पन, कठोरता और क्लासिकी रचाव लिए हुए है, जो उन्हें अपने दौर के शायरों में ख़ास बनाती है।