उर्दू शायरी के दो सबसे बड़े स्तंभों, मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा ग़ालिब का तुलनात्मक अध्ययन हमेशा से आलोचकों के लिए दिलचस्पी का कारण रहा है। फ़ारसी ज़बान से गहरे लगाव और दुर्लभ अल्फ़ाज़ के इस्तेमाल के बा-वुजूद, मीर के कलाम का आम माहौल ग़ालिब से बिल्कुल अलग महसूस होता है। इस बुनियादी फ़र्क़ की सबसे बड़ी वजह दोनों शायरों की कल्पना का स्वभाव है। ग़ालिब की कल्पना बहुत ज़्यादा 'तजरीदी' (Abstract) है, जबकि मीर की कल्पना आम तौर पर 'तज्सीम' (Concreteness) और ठोस चीज़ों के इर्द-गिर्द घूमती है।
ग़ालिब के ज़्यादातर फ़ारसी अल्फ़ाज़ और शब्द-रचनाएँ अदृश्य विचारों और ख़याली चीज़ों को बयान करते हैं, जिसकी वजह से उनकी शायरी का माहौल कई बार बहुत अजनबी और दुनिया से परे मालूम होता है। मिसाल के तौर पर ग़ालिब का यह मशहूर मिसरा (काव्य-पंक्ति) देखिए: हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम
यह मिसरा पूरी तरह तजरीदी है। इसे समझने के लिए पहले परवाने का 'दिल' फ़र्ज़ करना (मानना) पड़ता है जो अदृश्य है। फिर उस दिल का 'शबिस्तान' (ख़्वाबगाह) कल्पना में लाना पड़ता है जो पूरी तरह ख़याली है। और फिर उस शबिस्तान में 'चराग़ाँ' (रोशनी) की कल्पना करनी पड़ती है जो उससे भी ज़्यादा ख़याली है। इस्तिआरे (रूपक) के इस अनोखेपन ने शेर को हसीन तो बना दिया है, लेकिन यह हक़ीक़ी दुनिया से बहुत दूर है।
इसके विपरीत, मीर की कल्पना ठोस और दिखाई देने वाली चीज़ों से खेलती है। उनके यहाँ भी फ़ारसी शब्द-रचनाएँ हैं, लेकिन वे तजरीद के बजाए तज्सीम का रंग लिए हुए हैं। हालाँकि, इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि मीर तजरीदी (अमूर्त) विषय बाँधने में असमर्थ थे। जब मीर तजरीद की तरफ़ आते हैं तो वे ग़ालिब के बराबर, बल्कि कई बार उनसे भी आगे नज़र आते हैं। मीर का यह शेर देखिए:
शब फ़रोग़-ए-बज़्म का बाइस हुआ था हुस्न-ए-दोस्त
शमा का जल्वा ग़ुबार-ए-दीदा-ए-परवाना था
इस शेर को अगर ग़ालिब के दीवान में शामिल कर दिया जाए तो किसी को शक भी नहीं होगा कि यह ग़ालिब का नहीं है। इसमें परवाने की आँख (जो लगभग अदृश्य है), उसमें ग़ुबार (धूल) की कल्पना, और फिर शमा के जल्वे को उस ग़ुबार से जोड़ना, यह सब उसी आला दर्जे की तजरीद है जो ग़ालिब की ख़ासियत समझी जाती है।
उर्दू के ज़्यादातर काल्पनिक और तजरीदी अल्फ़ाज़ चूँकि फ़ारसी मूल के हैं, इसलिए ग़ालिब की फ़ारसियत उनकी तजरीदियत के लिए सोने पर सुहागा बन गई। लेकिन मीर ने साबित किया कि वे रोज़मर्रा और ठोस हक़ीक़तों के साथ-साथ, अलौकिक और तजरीदी कल्पना की उन बुलंदियों को भी छू सकते हैं जहाँ तक पहुँच हर शायर के बस की बात नहीं।
