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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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ज़हूर मिन्हास

ग़ज़ल 7

अशआर 21

ये भी मुमकिन है उर्दू ज़बाँ में कहूँ और दुनिया के फ़िक्शन से बेहतर लगे

आह भरने लगें रश्क करने लगें काफ़का मोपसां कोई ऐसी ग़ज़ल

काश मैं कह सकूँ अपने रंगीन ख़्वाबों में डूबी हुई लड़कियाँ जब पढ़ें

और पढ़ते समय ख़्वाब-गाहों में उड़ने लगें तितलियाँ कोई ऐसी ग़ज़ल

ये तो इंसानियत को ठोकर है

आदमी आदमी का नौकर है

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कोई भी हल नहीं उदासी का

मुझ से कमरे ने बारहा पूछा

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वो थक गई थी भीड़ में चलते हुए 'ज़हूर'

उस के बदन पे अन-गिनत आँखों का बोझ था

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