कँवल ज़ियाई
ग़ज़ल 8
अशआर 4
हमारा दौर अंधेरों का दौर है लेकिन
हमारे दौर की मुट्ठी में आफ़्ताब भी है
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हमारा ख़ून का रिश्ता है सरहदों का नहीं
हमारे ख़ून में गँगा भी चनाब भी है
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चंद साँसों के लिए बिकती नहीं ख़ुद्दारी
ज़िंदगी हाथ पे रक्खी है उठा कर ले जा
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जिस में छुपा हुआ हो वुजूद-ए-गुनाह-ओ-कुफ्र
उस मो'तबर लिबास पे तेज़ाब डाल दो
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