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लौह-ए-दाइरा

जौन एलिया

लौह-ए-दाइरा

जौन एलिया

MORE BYजौन एलिया

    मैं दाएरे पर पड़ा हुआ अपने ख़ूँ के धब्बों को चाटता हूँ

    कि मेरे होने का सारा इल्ज़ाम मेरे सर है

    लबों की दहलीज़ पर मिरी रूह कब से फ़रियाद कर रही है

    मैं अपने सीने में जल रहा हूँ मैं अपनी आँखों में बुझ रहा हूँ

    ये शाह-राहों का हादसा है मगर किसी को ख़बर नहीं है

    मुझे बचा लो मुझे बचा लो

    हुजूम-ए-आदम जवाब दे क्या ये कोई सहरा है शहर की रहगुज़र नहीं है

    मैं फिर आऊँगा मेरी आवाज़ फिर आएगी

    मेरा इसबात फिर टकराएगा तुम्हारी बतालतों से

    मगर मिरा बाल बाल मक़रूज़ है मिरे जब्र-ए-आगही का

    मैं अपनी आवाज़ का बदन हूँ

    जो चुप है उस की ज़बान उस के दहन में सड़ जाएगी

    मैं बोलूँगा और मिरा बोलना ही मेरा ज़ियाँ भी ठहरेगा

    मेरे सीने में जो ख़राशें सुलग रही हैं

    वो आख़िर-ए-कार मेरी लौह-ए-मज़ार का हाशिया बनेंगी

    जवाब की बस्तियों के दरवाज़े बंद हैं और मिरा गला ख़ुश्क हो चुका है

    तमाम इंसान अपनी परछाइयों को ओढ़े हुए हैं और शाम बह रही है

    धुँद ने चौक के बड़े बुर्ज का मुसल्लस निगल लिया है

    सुकूत का ज़महरीर सम्तों में घुल चुका है

    मैं एक संगीन मुजस्समा हूँ जिसे बना कर जिसे ख़याबाँ में नस्ब कर के

    मुजस्समा-साज़ और मे'मार अपना रोज़ीना पा चुके हैं

    मैं एक संगीं मुजस्समा हूँ

    जो धुँद की तैलिसान ओढ़े हुए हयूलों को तक रहा है

    मगर समा'अत का जाल अब जल्द बुन लिया जाए

    सुन लिया जाए

    मेरे अतराफ़ एक तूफ़ान उठने वाला है

    जो ज़मीनों को यूँ निगल लेगा जैसे ये लोग अपने लोगों का ख़ून-ए-बस्ता निगल रहे हैं

    मैं अपने सीने में जल रहा हूँ अपनी आँखों में बुझ रहा हूँ

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