तर्जुमानी
हम अब आज़ाद रहना चाहते हैं
दोस्तों के मश्वरों से
किताबों में लिखी बातों से और उन के नताएज से
'अक़ाएद से
हमें मा'लूम है
उन की नसीहत ज़िंदगी को ठीक रस्तों से गुज़ारेगी
मगर हम सोचते हैं
उन की बातों से निकलते सब नताएज
उन के होंगे
हमारी शख़्सियत का रंग उन में सत्ही सा होगा
या बिल्कुल भी नहीं
हम अपने मुख़्तसर से वक़्त को उन की रविश पर क्यों उभारें
हमारी बू हमारी ख़ू क्यों उस का पेश-ख़ेमा बन नहीं सकती
हमें इदराक है कि इस तरह से
कामयाबी कम मिले शायद
मगर इतना तो होगा
ज़िंदगी के बाब का जब आख़री रुक़’आ उलटने की घड़ी होगी
तो उस का इंतिसाब और हर्फ़-ए-आग़ाज़
सिर्फ़ अपनी ख़ुश-निगाही का नुमाइंदा बनेगा
और उस पुश्ते पे जो भी नाम कंदा होगा वो हतमन
हमारे होने की ख़ुशबू का इक पैग़ाम होगा
हमारा नाम होगा
हमें ये दूसरों और तीसरों की कामयाबी से
ख़ुद अपने आप में मस्त-ओ-मगन
हर राएगानी अच्छी लगती है
भले इस में कई नाकामियों का ज़िक्र शामिल हो
हमें होने की ज़ाती-तर्जुमानी अच्छी लगती है
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