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लब-ओ-दंदाँ ज़नख़दाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

अहमद रईस

लब-ओ-दंदाँ ज़नख़दाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

अहमद रईस

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    लब-ओ-दंदाँ ज़नख़दाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    ख़याल-ए-ज़ुल्फ़-ए-याराँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    रुख़-ए-ताबान-ए-जानाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    सियह ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    तुम्हारी तेग़-ए-अबरू हैं मिरी ग़ज़लों के दो मिसरे

    तुम्हारी चश्म-ए-हैराँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    ख़ुम-ओ-साग़र परेशाँ हैं शराब-ए-नाब है हैराँ

    तिरी चश्म-ए-ग़ज़ालाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    किसी के हिज्र में जलना कभी आँसू बहा देना

    पिघलती शम'-ए-अरमाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    तजल्ली नूर की बस हज़रत-ए-मूसा पे की ज़ाहिर

    चराग़-ए-ज़ेर-ए-दामाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    तुम्हारे लाम-ए-नस्ता'लीक़ या कोई शब-ए-हिज्राँ

    तुम्हारे तीर-ए-मिज़्गाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    लबों को कौसर-ओ-तसनीम लिखना यूँ तो आसाँ है

    जमाल-ए-माह-ए-कन’आँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

    गुलाब-ओ-अख़गर-ओ-याक़ूत आख़िर मैं कहूँ क्या क्या

    तिरे ला’ल-ए-बदख़्शाँ पर ग़ज़ल कहना क़यामत है

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