'इश्क़ को बा'इस-ए-तस्कीन-ए-दिल-ओ-जाँ समझा
'इश्क़ को बा'इस-ए-तस्कीन-ए-दिल-ओ-जाँ समझा
ये नई बात है मैं दर्द को दरमाँ समझा
इक ज़माना जिसे ग़ारत-गर-ए-ईमाँ समझा
हाए मैं उस बुत-ए-काफ़िर को मुसलमाँ समझा
मंज़िल-ए-'इश्क़ को दिल पहले तो आसाँ समझा
ठोकरें खाईं तो ये तिफ़्ल-ए-दबिस्ताँ समझा
न फ़लक तेरी हक़ीक़त से ख़बर-दार हुए
न तिरी राज़ की बातों को ये इंसाँ समझा
और बढ़ जाए न आशुफ़्ता-सरी 'आशिक़ की
अपने दीवानों को ओ ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ समझा
इसी रफ़्तार से होती है क़यामत बरपा
मैं तिरी चाल को ऐ फ़ित्ना-ए-दौराँ समझा
का'बा-ए-दिल को जब अल्लाह का घर मान लिया
इस के मेहमान को अल्लाह का मेहमाँ समझा
फूल बरसेंगे शहीदान-ए-वफ़ा पर 'मोहसिन'
उन का जाना तरफ़-ए-गंज-ए-शहीदाँ समझा
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