सदाक़त के त'अल्लुक़ से क़लम-कारी नहीं करते
सदाक़त के त'अल्लुक़ से क़लम-कारी नहीं करते
बहुत से आइने भी आइना-दारी नहीं करते
अमीर-ए-शहर की मिदहत न लिक्खी जाएगी हम से
कि जो ख़ुद्दार हैं वो कार-ए-दरबारी नहीं करते
किसी 'अय्यार से अच्छी तवक़्क़ो' ना-मुनासिब है
कि फ़स्ल-ए-गुल के साथी दुख में ग़म-ख़्वारी नहीं करते
उसे ख़ुश रखने को हम अपनी बाज़ी हार जाते हैं
कि जिस को चाहते हैं उस से हुशियारी नहीं करते
कहाँ यकसानियत है उन के ज़ाहिर और बातिन में
कि हैं जो हक़ के हामी वो रिया-कारी नहीं करते
है जिन में 'अज़्म वो मंज़िल की जानिब बढ़ते जाते हैं
भँवर में रह के भी इज़हार-ए-दुश्वारी नहीं करते
कई अहल-ए-चमन इस बात से नाराज़ रहते हैं
कि हम 'ए'जाज़' काँटों की तरफ़-दारी नहीं करते
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