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'इश्क़ इक शेवा-ए-बे-ज़रर है

फ़िराक़ गोरखपुरी

'इश्क़ इक शेवा-ए-बे-ज़रर है

फ़िराक़ गोरखपुरी

MORE BYफ़िराक़ गोरखपुरी

    'इश्क़ इक शेवा-ए-बे-ज़रर है

    इस के बा-वस्फ़ पुर-सद-ख़तर है

    तुझ को जो ख़ाक है मुझ को ज़र है

    आदमी आदमी की नज़र है

    बर्क़-ए-सय्याल-ए-ताबिंदगी

    दुख़्त-ए-रज़ है कि ये दुख़्त-ए-ज़र है

    ग़ौर से सुन कि रूह-उल-अमीं की

    मेरा हर शे'र आवाज़-ए-पर है

    शब-ए-हिज्र इतना बता दे

    कुछ यहाँ इंतिज़ाम-सहर है

    कर चुका हूँ मैं तर्क-ए-मोहब्बत

    बस तिरी मेहरबानी का डर है

    मुझ सियह-बख़्त की ख़ाक दिल

    सुर्मा-ए-चश्म-ए-शम्स-ओ-क़मर है

    क्या 'अदम एक आज़ादी-ए-दीद?

    क्या वुजूद एक क़ैद-ए-नज़र है

    हूँ रहीन-ए-रुसूम-ओ-रिवायात

    आह ज़िंदगी तू किधर है

    उस नज़र की करे कौन तशरीह

    जो नज़र-दर-नज़र-दर-नज़र है

    गुफ़्तुगू आबशार-ए-तरन्नुम

    एक मौज-ए-तबस्सुम नज़र है

    शहर-ए-ग़म के मज़ाफ़ात हैं ये

    बस कहीं पास ही मेरा घर है

    तिफ़्ल-ए-मा’सूम की इक नज़र सी

    मेरी 'अर्ज़-ए-वफ़ा मुख़्तसर है

    दौर-ए-आफ़ाक़ में 'इश्क़ की ज़ात

    मुक़्तदर है मियाँ मुक़्तदर है

    हाँ सँभल कर पियो बादा-ए-शे'र

    एक पिघला हुआ नेश्तर है

    मेरे नग़्मों ने बोसे दिए हैं

    हुस्न-ए-आफ़ाक़ अब मो'तबर है

    मेरे हर शे'र की ये घनी छाँव

    साहिल-ए-बहर-ए-ग़म का शजर है

    दे नज़र की असीरों को तौफ़ीक़

    जिस को दीवार समझे हैं दर है

    दूर-रस है कमंद-ए-तबस्सुम

    यूँ तो वो अपने मरकज़ ही पर है

    इक उतरता हुआ ख़्वाब-ए-सीमीं

    चाँद से चाँदनी का सफ़र है

    है ये मेरा ही तौर-ओ-वसलीक़ा

    कितना कम-याब ग़म का हुनर है

    दूर से जिस को मैं सुन रहा हूँ

    साज़ का नग़्मा-ए-मुंतज़र है

    सात रंगों की नाज़ुक फुवारें

    रक़्स-ए-क़ौस-ए-क़ुज़ह हर नज़र है

    बज़्म-ए-अहबाब ले मुझ से रुख़्सत

    साँस मेरी चराग़-ए-सहर है

    'फ़िराक़' अपनी क़द्र आप कर लूँ

    ना-शनासों की बस्ती में घर है

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