तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
तस्कीं को हम न रोएँ जो ज़ौक़-ए-नज़र मिले
इतना तो हो कि उन के मोहल्ले में घर मिले
तरमीम की दु'आ में ये तंग आ के शैख़ ने
जैसी भी हो जहाँ भी हो फ़ौरन मगर मिले
वो भी था फ़र्क़-ए-'इश्क़-ओ-मोहब्बत से बे-ख़बर
अपनी भी ये ख़ता थी कि दिल खोल कर मिले
हर वक़्त जान सूली पे हर साँस आख़री
बग़दाद बेहतर ऐसी मोहब्बत अगर मिले
मिलता नहीं वो हम से कि ख़ुद दिल में चोर है
अपने पे ए'तिमाद हो तो टूट कर मिले
सब अहल-ए-क़ाफ़िला थे मगर क़ाफ़िला न था
तन्हाई थी अगरचे बहुत हम-सफ़र मिले
ताख़ीर से पहुँचने पे अब दिल-मलूल हैं
वो सब दयार-ए-हुस्न में जो दर-ब-दर मिले
तुझ से बिगाड़ कर के करूँ क्या मैं ऐ नदीम
मेरी भड़ास निकले अगर चारागर मिले
तन्हाई से सुना है कि घबरा रहे हैं वो
शायद हमें भी कोई अब अच्छी ख़बर मिले
'ज़ामिन' ये कर रहा है इधर की उधर ज़रूर
इस बार चुप ही रहियो अगर नामा-बर मिले
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