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महका हुआ खिलता हुआ शादाब चमन है

अफ़ज़ल परवेज़

महका हुआ खिलता हुआ शादाब चमन है

अफ़ज़ल परवेज़

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    महका हुआ खिलता हुआ शादाब चमन है

    इक रूह-ए-लताफ़त है कि जानाँ का बदन है

    अंदाज़-ए-बयाँ में जो ये बे-साख़्ता-पन है

    तेरी ही फबन और मिरे दिल की लगन है

    दौराँ के बयाबाँ में ख़याबाँ तिरी आग़ोश

    इस धूप में आँचल ही तिरा साया-फ़गन है

    तारीकी-ए-हिज्राँ में उतरती ही चली जाए

    उम्मीद-ए-विसाल ऐसी लपकती सी किरन है

    दम लेने को बैठा हूँ तो इस दम हुआ महसूस

    छालों में जलन कितनी है किस दर्जा थकन है

    यारो कोई चारा करो शम' जलाओ

    इस घोर अँधेरे में सफ़र दूना कठन है

    मोहलत ही कहाँ 'अर्ज़-ए-तमन्ना की मिली है

    दिल और ज़बाँ में अभी घमसान का रन है

    सुन लेते हैं ना-कर्दा-वफ़ाओं के फ़साने

    महफ़िल में किसे तेरे सिवा ताब-ए-सुख़न है

    कह देता हूँ मैं सीधे सुभाओ से खरी बात

    वो कहते हैं 'परवेज़' बड़ा साहिब-ए-फ़न है

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