कहने वाले तिरे 'आरिज़ को कँवल कहते हैं
कहने वाले तिरे 'आरिज़ को कँवल कहते हैं
हम उसे देख के नज़रों में ग़ज़ल कहते हैं
अपने हम-राह लिए जाते हैं मरने वाले
एक ही चीज़ जिसे फ़र्द-ए-'अमल कहते हैं
जिस को अपना न कहा 'उम्र भर उस के न हुए
आप जो बात भी कहते हैं अटल कहते हैं
हज़रत-ए-शैख़ मसाइल से तो वाक़िफ़ हैं मगर
वही ग़ाएब है जिसे ज़ौक़-ए-'अमल कहते हैं
जिस का मम्नून-ए-करम अम्न-ओ-अमाँ होता है
हम हिक़ारत से उसे जंग-ओ-जदल कहते हैं
याद-ए-महबूब अगर शक्ल में ढल जाती है
देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं
आप कह दीजे हरीफ़ान-ए-सुख़न से ये 'अदील'
जो सुख़नवर हैं वो इस तरह ग़ज़ल कहते हैं
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