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ख़ुद में सिमट न जाए अगर क्या करे कोई

अनवर शऊर

ख़ुद में सिमट न जाए अगर क्या करे कोई

अनवर शऊर

MORE BYअनवर शऊर

    ख़ुद में सिमट जाए अगर क्या करे कोई

    है कोई दहर में कि तमन्ना करे कोई

    मंज़िल अगर नहीं सही रह-गुज़र तो हो

    या 'उम्र भर ख़लाओं में भटका करे कोई

    ये क्या कि एक पैकर-ए-नायाफ़्त के लिए

    अपने वुजूद पर भरोसा करे कोई

    बे-हिस है ख़िज़्र तक तो सिसकने से क्या हुसूल

    इन जंगलों में ज़ोर से चीख़ा करे कोई

    ये बे-ख़बर जिलौ में है किस ए'तिमाद से

    ऐसे में दिल के साथ धड़का करे कोई

    रह जाए सिर्फ़ साक़ी-ए-सीमीं-बदन का नाम

    हर चीज़ नज़्र-ए-साग़र-ओ-सहबा करे कोई

    है चश्म-ए-दीगराँ से ख़तरनाक चश्म-ए-ज़ात

    डर है तो अपने आप से पर्दा करे कोई

    चेहरे पे कर्ब-ओ-कशमकश-ओ-रंज-ओ-ग़म ग़रज़

    ऐसी शगुफ़्तगी कि तमाशा करे कोई

    वो बात कौन सी है जो तुझ से छुपाई जाए

    वो राज़ कौन सा है जो इफ़्शा करे कोई

    आसाँ है शरह-ए-नुक्ता-ए-दिल से कि बात में

    असरार-ए-काएनात हुवैदा करे कोई

    ऐसी बड़ी ख़ता तो नहीं ख़्वाहिशों का ज़िक्र

    खुल जाइए किसी से तो चर्चा करे कोई

    ये ख़ुश-गुमाँ तहारत-ओ-तक़्वा के जामा-ज़ेब

    दम तोड़ दें अगर इन्हें नंगा करे कोई

    तुझ को तो रास्त-गोई की लत पड़ गई 'श'ऊर'

    काश तेरे शे'र समझा करे कोई

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