ख़ुद में सिमट न जाए अगर क्या करे कोई
ख़ुद में सिमट न जाए अगर क्या करे कोई
है कोई दहर में कि तमन्ना करे कोई
मंज़िल अगर नहीं न सही रह-गुज़र तो हो
या 'उम्र भर ख़लाओं में भटका करे कोई
ये क्या कि एक पैकर-ए-नायाफ़्त के लिए
अपने वुजूद पर न भरोसा करे कोई
बे-हिस है ख़िज़्र तक तो सिसकने से क्या हुसूल
इन जंगलों में ज़ोर से चीख़ा करे कोई
ये बे-ख़बर जिलौ में है किस ए'तिमाद से
ऐसे में दिल के साथ न धड़का करे कोई
रह जाए सिर्फ़ साक़ी-ए-सीमीं-बदन का नाम
हर चीज़ नज़्र-ए-साग़र-ओ-सहबा करे कोई
है चश्म-ए-दीगराँ से ख़तरनाक चश्म-ए-ज़ात
डर है तो अपने आप से पर्दा करे कोई
चेहरे पे कर्ब-ओ-कशमकश-ओ-रंज-ओ-ग़म ग़रज़
ऐसी शगुफ़्तगी कि तमाशा करे कोई
वो बात कौन सी है जो तुझ से छुपाई जाए
वो राज़ कौन सा है जो इफ़्शा करे कोई
आसाँ है शरह-ए-नुक्ता-ए-दिल से कि बात में
असरार-ए-काएनात हुवैदा करे कोई
ऐसी बड़ी ख़ता तो नहीं ख़्वाहिशों का ज़िक्र
खुल जाइए किसी से तो चर्चा करे कोई
ये ख़ुश-गुमाँ तहारत-ओ-तक़्वा के जामा-ज़ेब
दम तोड़ दें अगर इन्हें नंगा करे कोई
तुझ को तो रास्त-गोई की लत पड़ गई 'श'ऊर'
ऐ काश तेरे शे'र न समझा करे कोई
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