मेहमान चार दिन के और घर समझ लिया है
मेहमान चार दिन के और घर समझ लिया है
हम ने सराब ही को मंज़र समझ लिया है
कितनों ने कर लिया है दुनिया को अब मुसख़्ख़र
ख़ुद को सिकंदरों से बरतर समझ लिया है
अच्छा है क्या बुरा क्या इस बात से ग़रज़ क्या
बस ज़ात ही को अपनी मेहवर समझ लिया है
भूले किताब को हम पैग़ाम सारा भूले
भटके मुसाफ़िरों को रहबर समझ लिया है
होते सबक़ नहीं जो अब याद इस जहाँ को
उन को निसाब ही से बाहर समझ लिया है
तहज़ीब अपनी खोई खो बैठे 'इल्म सारा
रंगीनी-ए-जहाँ को ज़ेवर समझ लिया है
ख़ुद नुक़्स से मुबर्रा ख़ुद 'ऐब से हैं 'आरी
और सब को रास्ते का पत्थर समझ लिया है
समझेगा ख़ाक कोई अब राज़ इस जहाँ के
क़तरे ने ख़ुद को 'अब्रक' सागर समझ लिया है
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