सोज़-ए-उल्फ़त दर्द-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर की बात है
सोज़-ए-उल्फ़त दर्द-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर की बात है
चारा-साज़ी की नहीं अब तो असर की बात है
जा-ए-हैरत है कि 'अह्द-ए-मौसम-ए-गुल में भी आज
जिस तरफ़ भी देखिए बर्क़-ओ-शरर की बात है
शाम का वा'दा था लेकिन अब सहर होने को है
कैसे वो भूले अभी तो दोपहर की बात है
तू किताब-ए-ज़िंदगानी को ज़रा पढ़ कर तो देख
हर वरक़ पर अपने ही ख़ून-ए-जिगर की बात है
वो मुझे ज़र्रा समझते हैं मैं उन को आफ़्ताब
अपनी अपनी वुस'अत-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र की बात है
इक़्तिज़ा-ए-वक़्त ने बदला है ऐसा रंग 'नूर'
अहल-ए-ज़ुल्मत की ज़बाँ पर भी सहर की बात है
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