सामने है मेरे जो कुछ वो मुझे जचता नहीं
सामने है मेरे जो कुछ वो मुझे जचता नहीं
दे सुकूँ जो क़ल्ब को मंज़र कोई ऐसा नहीं
बज़्म-ए-दुनिया से नहीं हट पाया मेरा ध्यान क्यूँ
जबकि पहले सा मिरा उस से कोई रिश्ता नहीं
ख़ुद ही अपने को नज़र आता हूँ मैं इक अजनबी
लगता है अन्दर है मेरे कोई जो मुझ सा नहीं
ज़िंदगी पर इक उदासी छाई सी लगती 'अजब
वो उदासी अर्थ जिस का मुझ पे ही खुलता नहीं
इक 'अजब मौसम का मंज़र देखता हूँ रात दिन
दूसरा मंज़र कोई दिल को भला लगता नहीं
सरसुती सी इक नदी पोशीदा मुझ में थी मगर
प्यास अपनी ख़ुद ही मैं उस से बुझा पाया नहीं
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