तुम जो ना-ख़ुश न हों तो ये पूछूँ ज़रा मोहतरम मुशफ़िक़ो मेहरबाँ दोस्तो
तुम जो ना-ख़ुश न हों तो ये पूछूँ ज़रा मोहतरम मुशफ़िक़ो मेहरबाँ दोस्तो
शमसुद्दीन ताबाँ
MORE BYशमसुद्दीन ताबाँ
तुम जो ना-ख़ुश न हों तो ये पूछूँ ज़रा मोहतरम मुशफ़िक़ो मेहरबाँ दोस्तो
जब तुम्हारी ज़रूरत रही है मुझे तुम थे ऐसे में आख़िर कहाँ दोस्तो
हम कहाँ थे कहाँ से कहाँ आ गए जा चुके सब कहाँ से कहाँ दोस्तो
मंज़िलों से परे मंज़िलें थीं बहुत कारवाँ थे पस-ए-कारवाँ दोस्तो
चाँद सूरज से महरूम शाम-ओ-सहर वक़्त है ज़ुल्मत-ए-शब के ज़ेर-ए-असर
कोई शय कोई मंज़र नुमायाँ नहीं हर तरफ़ है धुआँ ही धुआँ दोस्तो
दिल की मश'अल जलाए हुए रात भर सू-ए-मंज़िल रहे गामज़न हम-सफ़र
और नज़दीक-ए-मंज़िल क़रीब-ए-सहर लुट गया शौक़ का कारवाँ दोस्तो
रात तो रात है बल्कि रोज़-ए-सियह अपना साया भी रहता है हम से जुदा
सुब्ह-ए-‘इशरत जो थे दिलकश-ओ-दिल-कशाँ शाम-ए-ग़म हैं वो दामन-कशाँ दोस्तो
कुछ तअम्मुल अभी कुछ तहम्मुल अभी कुछ तफ़क्कुर अभी कुछ तदब्बुर अभी
रात कट जाएगी दिन निकल आएगा सुब्ह ने ली हैं अंगड़ाइयाँ दोस्तो
ज़िंदगी नूर भी ज़िंदगी नार भी ज़िंदगी फूल भी ज़िंदगी ख़ार भी
हर नफ़स है नई आज़माइश यहाँ हर क़दम है नया इम्तिहाँ दोस्तो
जल्वा-ए-यार से आँख पुर-नूर है 'इश्क़-ए-दिल-दार से क़ल्ब मा'मूर है
ज़िंदगी है हसीँ ज़िंदगी है जवाँ और है शौक़ रूह-ए-रवाँ दोस्तो
उन की आवाज़ है या है लय साज़ की ये है मीना की क़ुलक़ुल खनक जाम की
जैसे कानों में रस घोलता है कोई जैसे बजती हैं शहनाइयाँ दोस्तो
दस्त-ए-'ताबाँ' में वो मर्मरी हाथ है 'इश्क़ की ज़िंदगी हुस्न के साथ है
यूँ उभरती हैं आईना-ए-हाल में याद-ए-माज़ी की परछाइयाँ दोस्तो
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