ज़ीस्त क्या ज़ीस्त का मे'यार समझ लेते हैं
ज़ीस्त क्या ज़ीस्त का मे'यार समझ लेते हैं
कौन है साहिब-ए-किरदार समझ लेते हैं
उन से इंसाफ़ की उम्मीद न रक्खे कोई
वो तो मा'सूमों को ग़द्दार समझ लेते हैं
हौसला हो तो कोई काम भी दुश्वार नहीं
आप दुश्वार को दुश्वार समझ लेते हैं
मेरे पाँव में खनकती है जो ज़ंजीर-ए-वफ़ा
लोग पाज़ेब की झंकार समझ लेते हैं
सहन-ए-गुलशन में हैं कुछ अहल-ए-सियासत मौजूद
फूल को फूल नहीं ख़ार समझ लेते हैं
अपने होंटों में दबा लीजिए दिल की बातें
राज़ की बात समझदार समझ लेते हैं
आप के पास मुदावा है दुखों का शायद
आइए आप को ग़म-ख़्वार समझ लेते हैं
बाँध के सर पे कफ़न घर से निकलने वाले
गर्दिश-ए-वक़्त की रफ़्तार समझ लेते हैं
पार हो जाते हैं तूफ़ान-ए-बला से 'मुज़्तर'
'अज़्म को आहनी पतवार समझ लेते हैं
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