कभी तो मलेगा सुकून-ए-जिगर
कभी तो मलेगा सुकून-ए-जिगर
कहीं तो रुकेगा ये रख़्त-ए-सफ़र
ये दुनिया है इक 'आरज़ी जल्वा-गाह
न कर तू यहाँ पर क़याम-ए-सहर
लहू बेच कर जो कमाया गया
वही रिज़्क़ है बस मिरा मो'तबर
'अबस है ये शिकवा 'अबस ये गिला
नसीबों का लिक्खा है पेश-ए-नज़र
वो सूरज हो तुम जिस की ताबिंदगी
अँधेरों में लाती है नूर-ए-सहर
जो दरिया की मौजों से लड़ते रहे
उन्हीं को मिला है किनारा मगर
न बहरों से वाक़िफ़ न औज़ान से
मगर नाम रक्खा है अहल-ए-असर
ग़म-ए-रोज़गार-ए-जहाँ कुछ नहीं
तिरा ग़म अगर है मिरा हम-सफ़र
तिरा हर्फ़-ए-हक़ है ज़माने की जान
'रऊफ़' अब है तेरा ही सिक्का इधर
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