बुरी तक़दीर हो मेरी मगर इतनी बुरी क्यूँ हो
बुरी तक़दीर हो मेरी मगर इतनी बुरी क्यूँ हो
जिसे मैं दिल से चाहूँ जान का दुश्मन वही क्यूँ हो
किया जब रश्क का शिकवा तो बोले दिल को समझाओ
अगर दिल मेरे बस में हो तो फिर ये बात ही क्यूँ हो
वफ़ा तुम को नहीं आती वफ़ा तो मैं नहीं कहता
जफ़ाएँ तो किए जाओ जफ़ाओं में कमी क्यूँ हो
कहा जब मैं ने क्या हो तुम अगर हो मेरे पहलू में
तो बोले वो घड़ी क्यूँ आए ऐसी बात ही क्यूँ हो
मुझे 'आशिक़ न समझो ख़ुद-ग़रज़ समझो बुरा समझो
ये सब कुछ हो मगर अग़्यार के सर मुंसिफ़ी क्यूँ हो
मुकाफ़ात-ए-सितम पर दिलबरो दिल में ये हुज्जत है
वो कहता है अभी क्यूँ हो ये कहता है कभी क्यूँ हो
फ़क़त मेरे दिखाने को ख़फ़ा होते हैं दुश्मन से
अगर दिल में कुदूरत हो तो होंटों पर हँसी क्यूँ हो
'क़मर' मौत आए लेकिन कूचा-ए-जानाँ में क्यूँ आए
हमारे नाम से बद-नाम क़ातिल की गली क्यूँ हो
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