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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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टपके हैं अश्क-ए-ख़ूँ जो बराबर इधर उधर

वहीदुद्दीन ख़ाँ मतीन

टपके हैं अश्क-ए-ख़ूँ जो बराबर इधर उधर

वहीदुद्दीन ख़ाँ मतीन

MORE BYवहीदुद्दीन ख़ाँ मतीन

    टपके हैं अश्क-ए-ख़ूँ जो बराबर इधर उधर

    टुकड़े हैं ये जिगर के ज़मीं पर इधर उधर

    लाया है रंग ख़ून-ए-शहीदान-ए-आरज़ू

    घबरा के देखता है सितमगर इधर उधर

    पहलू बदल बदल के गुज़ारी शब-ए-फ़िराक़

    ऐसे चुभे हैं पहलू में नश्तर इधर उधर

    कैसे अलग करे कोई ज़ुल्मत को नूर से

    है ज़ुल्फ़ शाम-ए-सुब्ह के रुख़ पर इधर उधर

    उन के जबीन-ओ-'आरिज़-ओ-बाज़ू के दू-ब-दू

    बिखरी हुई है ज़ुल्फ़-ए-मो'अम्बर इधर उधर

    है बाग़बाँ के गोशा-ए-दिल में वो जल्वा-गर

    गुलचीं को क्या मिलेगा गुल-ए-तर इधर उधर

    रहरव को क्या मिलेगी कभी मंज़िल-ए-हयात

    राह-ए-तलब में भटका है रहबर इधर उधर

    बैठा हूँ इंतिज़ार में आया मेरे हाथ

    घूमा है गो कि बज़्म में साग़र इधर उधर

    दामन 'मतीन' उन का दरख़्शाँ है इस तरह

    जैसे गिरे हों आँख से गौहर इधर उधर

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