इकट्ठा ख़ुद को करे या कहीं बिखर जाए
इकट्ठा ख़ुद को करे या कहीं बिखर जाए
बताओ दिल से निकाला हुआ किधर जाए
इलाज-ए-दिल-ज़दगाँ में न कीजिए ताख़ीर
ये दर्द ऐसा न हो हद से ही गुज़र जाए
तू अपना हक़ तो जताता है ज़िंदगी पे मिरी
ये तितली क़ैद में आ कर न तेरी मर जाए
मैं मिस्ल-ए-साया तिरे साथ साथ चलती रहूँ
तू रह-गुज़ार-ए-तलब में जिधर जिधर जाए
बताइए मैं उसे बे-वफ़ा कहूँ न कहूँ
जो अहद-ए-'इश्क़ करे और फिर मुकर जाए
अगर मैं उस की मोहब्बत के आइने में रहूँ
मुझे यक़ीं है मिरी ज़िंदगी सँवर जाए
चली भी जाए अगर दौलत-ए-दिगर कोई
न मेरे हाथ से ये हर्फ़-ए-मो'तबर जाए
अगर वो साथ निभाने से डर रहा है मिरा
उसे कहो कि बहुत हो चुका मुकर जाए
लरज़ सी जाती हूँ ये सोचती हूँ जब भी 'उमूद'
मिरे हसीं का कहीं मुझ से दिल न भर जाए
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