'आलम कुछ और है दिल-ए-बे-इख़्तियार का
'आलम कुछ और है दिल-ए-बे-इख़्तियार का
देखें कहाँ गुज़रता है मौसम बहार का
जिस ने फ़रेब खाया न हो ए'तिबार का
समझेगा लुत्फ़ क्या वो ग़म-ए-इंतिज़ार का
मैं अपने आशियाँ में लगा दूँगा ख़ुद ही आग
उट्ठा अगर सवाल चमन के वक़ार का
काफ़ी है तेरी याद रफ़ाक़त के वास्ते
एहसान क्यूँ उठाएँ किसी ग़म-गुसार का
जो कहकशाँ के नाम से रौशन है चर्ख़ पर
क्या कहिए रास्ता है वो किस के दयार का
जिस को है ये ख़बर कि है ग़म जुज़्व-ए-ज़िंदगी
क्यूँ शिकवा-संज हो वो ग़म-ए-रोज़गार का
समझा किया ज़माना जिसे अपनी दास्ताँ
अफ़्साना था 'ज़फ़र' वो दिल-ए-सोगवार का
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