लहू उबल के बहारों में रंग भरने लगा
लहू उबल के बहारों में रंग भरने लगा
'उफ़ुक़ की कोख से सूरज नया उभरने लगा
ग़म-ओ-निशात के मेले लगे हैं सीनों में
इक 'अह्द पैदा हुआ है इक 'अह्द मरने लगा
किसी का बच के निकलना मुहाल है अब तो
उसी गली से हर इक रास्ता गुज़रने लगा
जुनूँ-फ़ज़ा हुई फिर संग-बारी-ए-तिफ़्लाँ
बदन से शीशे का हर पैरहन उतरने लगा
'अबस है कल के लिए तुम को पत्थरों की तलाश
जो दिल पे ज़ख़्म लगा है कब आज भरने लगा
किसी को आइना-ख़ानों में क्या पनाह मिले
अजल की राह से हर रास्ता गुज़रने लगा
गुलों की सेज को क़दमों से रौंद कर 'फ़ारिग़'
ज़माना हाल के काँटों पे पाँव धरने लगा
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