तुम्हारे साथ भी दिल को ख़ला सा लगता है
तुम्हारे साथ भी दिल को ख़ला सा लगता है
ये कैसा रब्त है जो फ़ासला सा लगता है
वो हँस के बात करे तो यक़ीन आता नहीं
उदास हो तो मुझे आश्ना सा लगता है
तुम्हारी याद में हम ठीक से नहीं सोते
हमें तो जागना इक मसअला सा लगता है
वो मेरी सोच मिरा ख़्वाब मेरी दुनिया है
हो रू-ब-रू जो मिरे मो'जिज़ा सा लगता है
उस आइने की अगर ग़ैरियत को देखो तो
मिरा ही 'अक्स मुझे दूसरा सा लगता है
किसी के हिज्र ने बदला है इस क़दर मुझ को
हर एक शख़्स मुझे बावला सा लगता है
वो अपनी ज़ात में गुम है तो गुम रहे लेकिन
वो बे-रुख़ी में भी कुछ आश्ना सा लगता है
वो मेरे दिल में भी है मेरी दस्तरस में भी
मगर सुकून नहीं मसअला सा लगता है
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