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ज़ियादा कम का कहाँ वो हिसाब रखता है

ज़फ़र मिर्ज़ापुरी

ज़ियादा कम का कहाँ वो हिसाब रखता है

ज़फ़र मिर्ज़ापुरी

MORE BYज़फ़र मिर्ज़ापुरी

    ज़ियादा कम का कहाँ वो हिसाब रखता है

    उजाला सब के लिए माहताब रखता है

    वो देख लेता है हर शय को अपनी आँखों से

    और अपने हुस्न को ज़ेर-ए-नक़ाब रखता है

    जो ख़त को पढ़ लो मो'अत्तर दिमाग़ हो जाए

    वो हर्फ़ हर्फ़ में बू-ए-गुलाब रखता है

    ये और बात है ख़ामोश है वो मस्लहतन

    जो हर सवाल का अच्छा जवाब रखता है

    तुम उस के रंज को किस तरह जान पाओगे

    सजा के रुख़ पे जो दिल की किताब रखता है

    बग़ैर उस की इजाज़त के छू नहीं सकते

    वो दाने दाने का अपने हिसाब रखता है

    उसी को मिलती है ता'बीर-ए-नौ की शादाबी

    जो अपनी आँखों में ख़ुश-रंग ख़्वाब रखता है

    कोई शुमार नहीं उस का इस ज़माने में

    जो गुफ़्तुगू में 'ज़फ़र' जी जनाब रखता है

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