सजा सजा के रखा जिन को आइनों की तरह
सजा सजा के रखा जिन को आइनों की तरह
गिरे नज़र से तो बिखरे हैं किर्चियों की तरह
बुझे बुझे हैं पुरानी मोहब्बतों के गुलाब
सबा गुज़र गई बे-मेहर सा'अतों की तरह
बिखर गए तो समेटा न ज़िंदगी ने हमें
निखर गए तो दमकते हैं मोतियों की तरह
नहीं किसी से शिकायत कि बार-हा हम ने
ख़ुद अपने घर को जलाया है मश'अलों की तरह
यही मिज़ाज है अपना किसी का दिल न दुखे
जुदाइयों को भी चाहा है क़ुर्बतों की तरह
तिरी तलब का दिल-आवेज़ हादसा हम ने
भुला दिया है कई और हादसों की तरह
जो दिल का नूर नज़र का सुरूर थे वो लोग
हमीं से पेश अब आए हैं दुश्मनों की तरह
फ़लक-नशीनो ज़मीं की तरफ़ कभी देखो
हैं पस्तियाँ भी मुक़द्दस बुलंदियों की तरह
बस इक उचटती नज़र उस तरफ़ भी ऐ शह-ए-हुस्न
जो रास्तों में खड़े हैं मुसाफ़िरों की तरह
कोई क़रीब तो है जिस के फ़ैज़ से 'मोहसिन'
ख़याल ज़ेहन में बजते हैं घुंघरुओं की तरह
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