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ख़ुश्बू रिवायतों की हो फ़िक्र-ए-सुख़न के साथ

राज़ी अबूज़र

ख़ुश्बू रिवायतों की हो फ़िक्र-ए-सुख़न के साथ

राज़ी अबूज़र

MORE BYराज़ी अबूज़र

    ख़ुश्बू रिवायतों की हो फ़िक्र-ए-सुख़न के साथ

    रखिए ग़ज़ल सजा के नए पैरहन के साथ

    नर्मी है मोम की सी बसी लफ़्ज़ लफ़्ज़ में

    ख़ुशबू है शम'-ए-फ़िक्र की दिल में जलन के साथ

    हम काग़ज़ी नुक़ूश के ख़ानों में बँट गए

    महदूद क्यूँ हों सरहदें दिल की वतन के साथ

    पहचानिए भी कैसे कि मेरी सदी के लोग

    चेहरे बदलते रहते हैं अब पैरहन के साथ

    रस्मन सही सलाम तो करने लगे हैं वो

    बल दे के अब्रूओं पे रुख़-ए-पुर-शिकन के साथ

    थकती नहीं कभी ये उमीदें दु'आओं से

    सज्दे में सो गया हूँ भले ही थकन के साथ

    मुरझा रहे हैं फूल ख़यालों के दम-ब-दम

    चश्म-ए-हुनर की धूप में जलते बदन के साथ

    सिमटी है काइनात मिरे ला-शु'ऊर में

    बढ़ती हैं इस की वुस'अतें 'राज़ी' ज़मन के साथ

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