आतिश-ए-ग़म को ख़लिश रहती न पैराहन के साथ
जल गया होता गरेबान-ए-क़बा दामन के साथ
सख़्त मुश्किल यक-दिली ऐ दोस्त है दुश्मन के साथ
संग होता मैं तो रखता राब्ता आहन के साथ
मर्ग का ग़म रोज़-ए-ख़िल्क़त से है जान-ओ-तन के साथ
किश्त से आई है ये बर्क़-ए-फ़ुग़ाँ ख़िर्मन के साथ
क्यूँ नज़र आते नहीं पीरी में या-रब दिल के दाग़
ये चमन भी क्या ख़िज़ाँ में लुट गया गुलशन के साथ
गिर्या-ए-मौलूद देता है ख़बर उस रम्ज़ की
ख़ून-ए-दिल भी है चराग़-ए-‘उम्र में रोग़न के साथ
दोस्तों के साथ तू एहसाँ में करता है क़ुसूर
मर्द नेकी में कमी करते नहीं दुश्मन के साथ
सोज़-ए-ग़म से दिल के जलने का अगर आए ख़याल
सा'इक़ा की बद-सुलूकी याद कर ख़िर्मन के साथ
तुंद-ख़ूई के सबब से हो गए शो'ले फ़ना
रह गया दूद-ए-सियह लिपटा हुआ गुलख़न के साथ
बर्क़ बन कर साया-ए-दीवार हम पर क्यूँ गिरा
कोई गुस्ताख़ी न की थी आँख ने रौज़न के साथ
ज़िंदगानी में तबी'अत थी जो तन्हाई-पसंद
किस क़दर मानूस मेरा दिल हुआ मदफ़न के साथ
दोस्तों का ऐ ज़मीन-ए-क़ब्र क्या शिकवा करूँ
जान मेरी जब न आए तेरे घर में तन के साथ
दूँ मह-ओ-ख़ुर्शीद से तमसील कोई बात है
उन को निस्बत क्या तुम्हारे 'आरिज़-ए-रौशन के साथ
शर्त-ए-अव्वल इस्तिजाबत में है इज़'आन-ए-दु'आ
क्यूँ उठाता है दु'आ को हाथ सू-ए-ज़न के साथ
मंज़िल-ए-तासीर तक मुमकिन नहीं हरगिज़ वसूल
शूमी-ए-क़िस्मत है साये की तरह शेवन के साथ
ज़ब्ह मुझ को हाथ रख कर मेरे सीने पर करो
काम-ए-जाँ हासिल करे दिल भी रग-ए-गर्दन के साथ
शुक्र है वो तुर्क-ताज़ी को तो आए क़ब्र पर
हम न लिपटे ख़ाक ही लिपटी सुम-ए-तौसन के साथ
क़ुर्ब-ए-मर्द-ए-बे-हक़ीक़त से ग़नी को नफ़' क्या
एक है होना न होना मूर का ख़िर्मन के साथ
और अब क्या होंगे नाज़ुक वो मिसी मालीदा लब
'अक़्ल की मीज़ाँ में तुलते हैं गुल-ए-सौसन के साथ
क्या समझता है निगाह-ए-यार के नावक को तू
तोड़ता है उस्तुख़्वाँ सीने के ये जोशन के साथ
ताज़गी में लाला-ओ-गुल से भी निकले कुछ फ़ुज़ूँ
दिल के दाग़ों का जब अंदाज़ा किया गुलशन के साथ
आँख वो रहती नहीं बा'द-अज़-हुसूल-ए-काम-ए-दिल
कैद है मर्दों का इज़हार-ए-मोहब्बत ज़न के साथ
अब तो आँखें पीर-ए-कन'आँ' की खुलेंगी ऐ नसीम
बू-ए-यूसुफ़ मिस्र से जाती है पैराहन के साथ
देखने का है तमाशा शम' का फ़ानूस में
तन की 'उर्यानी हुई है जम' पैराहन के साथ
क्यूँ करें यूसुफ़ ज़ुलेख़ा की शिकायत का मलाल
चाक है इज़हार-ए-'इस्मत के लिए दामन के साथ
क्यूँ न ज़ेर-ए-ख़ाक ताबिंदा हों मेरे दाग़-ए-दिल
था मोहब्बत का त'अल्लुक़ किस रुख़-ए-रौशन के साथ
क्या अभी देते हैं बू सीने के अन्दर दिल के दाग़
नूर ये कैसा है या-रब ज़ुल्मत-ए-मदफ़न के साथ
रौशनी सहरा में की है मुंतज़िर बैठे हैं ख़ुद
ये मोहब्बत रह-नवर्द-एॉवादी-ए-ऐमन के साथ
जादा-ए-अजदाद पर 'कामिल' मुनासिब है सुलूक
आश्ती उन की तरह करते रहो दुश्मन के साथ
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