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बहुत हसीं है ये पहलू भी बे-रुख़ी की तरह

शायर लखनवी

बहुत हसीं है ये पहलू भी बे-रुख़ी की तरह

शायर लखनवी

MORE BYशायर लखनवी

    बहुत हसीं है ये पहलू भी बे-रुख़ी की तरह

    कभी कभी जो वो मिलते हैं अजनबी की तरह

    गए थे देखने उन को मगर न देख सके

    गुज़र गए वो निगाहों से रौशनी की तरह

    हम आज तक न ये समझे कि इल्तिफ़ात उन का

    अजल की तरह हसीं है कि ज़िंदगी की तरह

    इस इक अदा-ए-मोहब्बत पे ज़िंदगी सदक़े

    गुरेज़ हम से है लेकिन सुपुर्दगी की तरह

    अदा-ए-जौर की यकसानियत को क्या कहिए

    सता रहा है ज़माना भी आप ही की तरह

    किधर न जाएँ किधर जाएँ रहरवान-सहर

    चमक रहा है अँधेरा भी रौशनी की तरह

    बहुत बुलंद है महलों से ख़ाना-ए-मुफ़्लिस

    यहाँ तो धूप भी आती है चाँदनी की तरह

    ये कम नहीं है कि बख़्शा है उस ने ऐ 'शा'इर'

    वो इल्तिफ़ात कि नाज़ुक है बरहमी की तरह

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