'आशिक़ की दु'आ तिरा बदन है
'आशिक़ की दु'आ तिरा बदन है
तस्वीर-ए-वफ़ा तिरा बदन है
कर दे जो फ़रिश्तों को भी इंसाँ
कितना अच्छा तिरा बदन है
'आलम 'आलम जमाल तेरा
दुनिया दुनिया तिरा बदन है
आ जाए ख़ुदा को प्यार जिस पर
प्यारे ऐसा तिरा बदन है
हर 'उज़्व तरन्नुम-ए-मुजस्सम
इक बज़्म-ए-ग़िना तिरा बदन है
क्या क्या आता है मेरे जी में
कैसा कैसा तिरा बदन है
सहरा सहरा मिरी मोहब्बत
दरिया दरिया तिरा बदन है
जैसे पर्दे में रागनी हो
यूँ ज़ेर-ए-क़बा तिरा बदन है
मैं नींद में हूँ कि जागता हूँ
इक ख़्वाब है या तिरा बदन है
हर 'उज़्व है ए'तिराफ़-ए-सन'अत
ता'रीफ़-ओ-सना तिरा बदन है
जिस की फ़ितरत को थी तमन्ना
वो नश्व-ओ-नुमा तिरा बदन है
निकली थी जो रहमतों के दिल से
प्यारे वो दु'आ तिरा बदन है
जो ख़ुद को चुरा रहा हो हर-दम
वो दुज़्द-ए-हया तिरा बदन है
उमड़ा हुआ सैल-ए-रंग-ओ-निकहत
क्या मौज-नुमा तिरा बदन है
गूँजे हुए ना-शुनीदा नग़्मे
इक साज़-ए-हया तिरा बदन है
छाई कैफ़िय्यतों की मानिंद
घनघोर घटा तिरा बदन है
जैसे कौंदा लपकने के क़ब्ल
ठहरा ठहरा तिरा बदन है
जैसे कोई ख़्वाब गीत बन जाए
शा'इर की नवा तिरा बदन है
शायद ही ज़बान दे सके साथ
हम क्या कहें क्या तिरा बदन है
सफ़ अन्दर सफ़ हैं इस्ति'आरे
प्यारे क्या क्या तिरा बदन है
गुमसुम है 'फ़िराक़' महव-ए-दीदार
हैरत की सरा तिरा बदन है
- प्रकाशन : अहमद नदीम क़ासमी (1963)
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