मीर की शायरी में इस्तिआरा (रूपक), किनाया (संकेत) और क़ौल-ए-मुहाल (विरोधाभास) का इस्तेमाल
यह लेख मीर तक़ी मीर की शायरी में इस्तिआरे (रूपक) और किनाये (संकेत) के पेचीदा इस्तेमाल पर रोशनी डालता है, और पश्चिमी आलोचना के हवालों से साबित करता है कि मीर के यहाँ इस्तिआरे महज़ सजावट नहीं बल्कि क़ौल-ए-मुहाल (विरोधाभास) और तंज़ (व्यंग्य) का ज़रिआ है।