फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और क्लासिकी अलामात (प्रतीकों) का नया रूप: एक तनक़ीदी मुग़ालता (भ्रम)
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के मुताबिक़, फ़ैज़ की महानता सिर्फ़ क्लासिकी अल्फ़ाज़ को नए सियासी मानी पहनाने में नहीं छिपी है, बल्कि यह दावा उनकी शायरी की समझ को महदूद (सीमित) करता है।