उर्दू रस्म-उल-ख़त (लिपि) की देसी जड़ें: विदेशी होने की ग़लत-फ़हमी
उर्दू रस्म-उल-ख़त (लिपि) पूरी तरह से हिंदुस्तानी आवाज़ों के अनुकूल है। इसमें हिंदी की हकार (महाप्राण) और माकूसी (मूर्धन्य) आवाज़ों के लिए सोलह अलामतों (चिह्नों) का इज़ाफ़ा इसे अरबी और फ़ारसी से अलग और देसी बनाता है।