ग़ज़ल और फ़लसफ़ा: जज़्बे और विज्दान (अंतर्ज्ञान) की शेरी-मंतिक़ (काव्यात्मक तर्क)
उर्दू ग़ज़ल ज़ाहिरी तौर पर हुस्न और इश्क़ की दास्तान है, लेकिन अपनी रम्ज़िया (प्रतीकात्मक) ज़बान और शेरी-मंतिक़ (काव्यात्मक तर्क) के कारण ये ज़िंदगी और कायनात के गहरे फ़लसफ़ियाना (दार्शनिक) सवालों को भी बख़ूबी बयान करती है।