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मस्जिद पर शेर

एक परिंदा चीख़ रहा है मस्जिद के मीनारे पर

दूर कहीं गंगा के किनारे आस का सूरज ढलता है

नूर बिजनौरी

ये मिसरा लिख दिया किस शोख़ ने मेहराब-ए-मस्जिद पर

ये नादाँ गिर गए सज्दों में जब वक़्त-ए-क़याम आया

मस्जिद की मेहराब पर यह पंक्ति किस शरारती आदमी ने लिख दी?

ये बेसमझ लोग खड़े होने के समय सज्दे में गिर पड़े।

इस शेर में व्यंग्य के जरिए दिखाया गया है कि कुछ लोग धर्म को समझकर नहीं, बस रस्म की तरह निभाते हैं। मेहराब पर लिखा वाक्य उनके भ्रम को उजागर कर देता है। नमाज़ में जिस वक्त खड़ा होना चाहिए, उसी वक्त सज्दा कर देना उनकी नासमझी और अंधी नकल का संकेत है। भाव यह है कि इबादत जागरूकता और सही समझ के साथ होनी चाहिए।

अल्लामा इक़बाल

पुख़्ता कर ले ज़ाहिद अपना ईमाँ

मस्जिद से पहले मय-ख़ाना पड़ता है

अब्दुल वक़ार
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