ग़ालिब का इस्तिआरा (रूपक): रूप और विषय का हैरत-अंगेज़ संगम
ग़ालिब की मुश्किल-पसंदी का अस्ल राज़ उनके इस्तिआरे (रूपक) के इस्तेमाल में छिपा है, जहाँ वे विरोधी सच्चाइयों को मिलाकर एक ऐसी बहुआयामी सच्चाई रचते हैं जिसे शेर से अलग नहीं किया जा सकता।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
ग़ालिब की मुश्किल-पसंदी का अस्ल राज़ उनके इस्तिआरे (रूपक) के इस्तेमाल में छिपा है, जहाँ वे विरोधी सच्चाइयों को मिलाकर एक ऐसी बहुआयामी सच्चाई रचते हैं जिसे शेर से अलग नहीं किया जा सकता।