बल पड़े चितवन पे अबरू तन के ख़ंजर हो गए
ज़िक्र-ए-वस्ल आते ही वो जामे से बाहर हो गए
जब उस ने हार के ख़ंजर ज़मीं पे फेंक दिया
तमाम ज़ख़्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या
परचम-ए-अमन लिए फिरता था ज़ाहिर में जो हाथ
मैं ने 'ए'जाज़' उसी हाथ में ख़ंजर देखा
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
बल पड़े चितवन पे अबरू तन के ख़ंजर हो गए
ज़िक्र-ए-वस्ल आते ही वो जामे से बाहर हो गए
जब उस ने हार के ख़ंजर ज़मीं पे फेंक दिया
तमाम ज़ख़्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या
परचम-ए-अमन लिए फिरता था ज़ाहिर में जो हाथ
मैं ने 'ए'जाज़' उसी हाथ में ख़ंजर देखा