ग़ज़ल की अलामतों में बग़ावत: हसरत मोहानी का सियासी तग़ज़्ज़ुल
हसरत मोहानी ने ग़ज़ल की रिवायती इश्क़िया अलामतों (प्रतीकों) और इशारों का इस्तेमाल करते हुए अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ अपने बाग़ी और सियासी जज़्बात का बहुत ख़ूबसूरती से इज़हार किया।
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हसरत मोहानी ने ग़ज़ल की रिवायती इश्क़िया अलामतों (प्रतीकों) और इशारों का इस्तेमाल करते हुए अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ अपने बाग़ी और सियासी जज़्बात का बहुत ख़ूबसूरती से इज़हार किया।
मीर तक़ी मीर के यहाँ 'गुल' (फूल) और 'चमन' (बाग़) की अलामतें (प्रतीक) ख़ुद-रौ (अपने आप उगने वाली) फ़ितरत (प्रकृति) की नहीं, बल्कि उभरती हुई शहरी तहज़ीब और मुग़लों के नफ़ासत-पसंद (सुरुचिपूर्ण) 'पाईं बाग़' की अक्कास (दर्शाने वाली) हैं।
पिछली एक सदी के उर्दू अदब पर पंजाब वालों की गहरी छाप है, जिसके बिना उर्दू शायरी और नस्र (गद्य) का दामन बेहद ग़रीब और ख़ाली नज़र आता है।
उर्दू और पंजाबी ने एक दूसरे को बाहरी तौर पर प्रभावित नहीं किया है, बल्कि पंजाब की एक ही रूह ने अपने जज़्बाती इज़हार के लिए पंजाबी और फ़िक्री (वैचारिक) इज़हार के लिए उर्दू को चुना है।
उर्दू रस्म-उल-ख़त (लिपि) पूरी तरह से हिंदुस्तानी आवाज़ों के अनुकूल है। इसमें हिंदी की हकार (महाप्राण) और माकूसी (मूर्धन्य) आवाज़ों के लिए सोलह अलामतों (चिह्नों) का इज़ाफ़ा इसे अरबी और फ़ारसी से अलग और देसी बनाता है।
इंतज़ार हुसैन ने पश्चिमी कहानी की बनावट को रद्द करते हुए उर्दू फ़िक्शन को दास्तान, हिकायत और कथा के पूर्वी अंदाज़ से वाक़िफ़ कराया, जिससे कहानी में सुनने-सुनाने का लुत्फ़ दोबारा पैदा हुआ।
आर्ट का मक़सद सस्ती-जज़्बातियत (भावुकता) या हवस उभारना नहीं बल्कि जज़्बात का कैथार्सिस करके इंसान को तवाज़ुन (संतुलन), सुकून और जमालियाती-तहय्युर (सौंदर्यपरक आश्चर्य) देना है।
इंतज़ार हुसैन ने अपने दूसरे दौर में इंसान के रूहानी पतन, हवस और जिबिल्ली (मूल प्रवृत्ति के) दबाव को तमसीलों (रूपकों) और पौराणिक प्रतीकों के ज़रिए पेश किया है, जहाँ इंसान बंदर, कुत्ते या मक्खी में तब्दील हो जाता है।
अपने आख़िरी दौर में इंतज़ार हुसैन ने बौद्ध जातकों, हिंदू देवमाला और सामी (सेमिटिक) रिवायतों (परंपराओं) को मिलाकर इंसानी बक़ा (अस्तित्व) और कायनाती (ब्रह्मांडीय) सच्चाइयों को एक नई आफ़ाक़ी (सार्वभौमिक) दिशा दी।
मर्सिया और ड्रामा ज़ाहिरी तौर पर दो अलग विधाएँ हैं, लेकिन गहरे अध्ययन से उनके बीच संवाद, टकराव और कशमकश जैसी हैरत-अंगेज़ तकनीकी समानताएँ सामने आती हैं।
उर्दू एक ख़ालिस (शुद्ध) हिंद-आर्याई ज़बान है जिसकी बुनियाद खड़ी बोली पर है, और इसे महज़ अरबी या फ़ारसी का हिस्सा समझना इसकी भाषाई पहचान के साथ ना-इंसाफ़ी है।
बे-पनाह मक़बूलियत, मुहब्बत में नाकामी और आर्थिक बदहाली ने मजाज़ को शराब की तरफ़ धकेल दिया, मगर इन तमाम तल्ख़ियों (कड़वाहटों और दुखद अनुभवों) के बा-वुजूद उनकी वज़ादारी (शिष्टाचार) और ख़ुलूस (सच्चाई) में कभी कमी नहीं आई।
मंटो ने उर्दू अफ़साने (कहानी) में एक नई राह तय की और पाठक को चौंका कर समाज के मुर्दा ज़मीर को झिंझोड़ने का फ़र्ज़ अंजाम दिया।
माइकल एंजेलो, रोडिन और एपस्टीन जैसे अज़ीम मूर्तिकारों ने नग्नता को इंसानी जज़्बात की शिद्दत, रूहानियत और विकासवादी कशमकश को ज़ाहिर करने के लिए इस्तेमाल किया।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और मजाज़ का रिश्ता बहुत गहरा था, और उनकी नज़्म 'नज़्र-ए-अलीगढ़' इस तालीमी (शैक्षणिक) और तहज़ीबी संस्थान की महानता का ला-फ़ानी (अमर) तराना बन गई।
इस्मत चुग़ताई ने अपने अफ़सानों (कहानियों) में मध्यमवर्गीय मुस्लिम घरानों की जिंसी (यौन) और नफ़्सियाती (मनोवैज्ञानिक) घुटन को बे-बाकी से पेश किया और घिसी-पिटी रिवायतों (परंपराओं) के खोखले निज़ाम (व्यवस्था) को बे-नक़ाब किया।
तरक़्क़ी-पसंद तहरीक (प्रगतिशील आंदोलन) सिर्फ़ एक साहित्यिक रुजहान नहीं बल्कि ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों और प्रकृति की रंगीनियों को अदब का हिस्सा बनाने का एक सोच-समझ कर किया गया विरोध थी।
विल्हेम रीच (Wilhelm Reich) के विचारों की रोशनी में फ़िराक़ गोरखपुरी का इश्क़ और 'हवस' का तसव्वुर पारंपरिक उर्दू शायरी से बिल्कुल अलग है। फ़िराक़ के नज़दीक अहल-ए-हवस (हवस वाले) वो हैं जो निशात और ख़ुशी की शिद्दत को बरदाश्त करने की सलाहियत नहीं रखते।
इस्मत चुग़ताई ने मरने के बाद जलाए जाने की वसिय्यत करके एक आख़िरी बार रिवायत तोड़ी, जिसके पीछे मौत का ख़ौफ़ और उनकी ख़ास ज़िद्दी तबीयत काम कर रही थी।
यह लेख फ़िराक़ गोरखपुरी की ग़ज़ल में हिंदुस्तानी लहजे की मौजूदगी और 'ख़ुदा-ए-सुख़न' मीर तक़ी मीर की क्लासिकी रिवायत को फिर से ज़िंदा करने पर रोशनी डालता है।
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